थोड़ा वक्त लगता है……

Motivational Poem By Sourabh kushwaha

हसीं ख्वाबो को जीने में थोड़ा वक्त लगता है,

जमीं को असमा होने में थोड़ा वक्त लगता है,

नही होता मुकम्मल इश्क़ बस दो चार वारो में,

चांद को पूर्णिमा होने में थोड़ा वक्त लगता है,


सहर को शाम होने में थोड़ा वक्त लगता है,

जहर को जाम होने में थोड़ा वक्त लगता है,

लगाकर पेड़ को कल ही न हो फल की कोई आशा,

कली को आम होने में थोड़ा वक्त लगता है


कल जो बेखबर थे आज वो सब खाश हो गए,

कल जो बीज थे मिट्टी से मिलके शाख हो गए,

फ़िज़ा में लग गई है जो आग मजहब की तो सब्र रखो,

लगी को राख होने में थोड़ा बक्त लगता है


और युही अंबुधर बनके वो जर्रो पर नही छाया ,

धुंए को अस्मा होने में थोड़ा वक्त लगता है,

Written By-Saurabh kushwaha

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